सांप्रदायिक सौहार्द कायम कर शांति के माहौल को मजबूती दें:सुमित
चकाई के पूर्व विधायक माननीय सुमित कुमार सिंह जी ने कहा है कि विकास की बात सभी करते हैं. लेकिन विकास साकार नहीं हो पाता है. कभी हम सोचते हैं कि ऐसा क्यों है? उदाहरण के तौर पर अपने राज्य बिहार पर गौर करें. आखिर हमारा बिहार इतना पिछड़ा क्यों है? मेरी राय में इसके बहुत सारे कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह बिहार में हिंसा का बोलबाला. पूरे बिहार में जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे, जातीय बड़े-बड़े नरसंहार, माओवाद-नक्सलवाद का हिंसात्मक कहर. क्या ऐसी अशांति के बीच हम प्रगति की कल्पना कर सकते हैं? हम सबके यहां कहा गया है -- जब नाश मनुज पर छाता है, उसका विवेक मर जाता है. ऐसे में हिंसा परवान पर हो तो क्या कोई क्षेत्र तरक्की कर सकता है. मध्य बिहार में एक-से-बढ़कर एक नरसंहार को अंजाम दिया जा रहा था. दलेलचक बघौरा, बारा, सेनारी, लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर आदि में कई दर्जन लोगों, दूधमुंहें बच्चों तक को इंसानियत के दुश्मनों ने मार डाला था. वहीं मध्य बिहार, जमुई, गया, कैमूर, पूर्वी चंपारण, शिवहर, सारण आदि कई जिले भीषण माओवाद के गढ़ बन गए थे. भागलपुर, सीतामढ़ी, बिहारशरीफ, नवादा आदि जिले साम्प्रदायिक दंगों के केंद्र बने हुए थे. भागलपुर का दंगा तो बदनुमा दाग बन गया था. इसके अलावा जो जिले थे वह जबरदस्त अपराध के केंद्र बने हुए थे. ऐसे में कौन सा विकास हो सकता था, कौन सी तरक्की हो सकती थी? कौन यहां निवेश करने आता, कौन यहां बड़ा उद्योग और व्यवसाय स्थापित करता? जब सरकारों का सरोकार लाशों को गिनने और उसके जातिगत सम्प्रदायगत पहचान के आधार पर कार्रवाई करने तक सीमित रही, वैसे हालात में क्या कोई कार्य संस्कृति विकसित हो सकती थी? क्या कोई प्रगति पथ निर्मित हो सकता था? क्या कोई सुकून से आगे बढ़ने को सोच सकता था? कदापि नहीं. लिहाज़ा, मेरी एक गुजारिश है कि पहले जातीय-सांप्रदायिक सौहार्द कायम करें, शांति के माहौल को मज़बूती दें. तभी वास्तव में विकास हो सकता है. बिना किसी बहकावे में आये शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए प्रयत्न को मज़बूती दें.
-अभिषेक कुमार सिंह, जमुई।
-अभिषेक कुमार सिंह, जमुई।
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